Monday, August 4, 2014

'आह'


किसी ज़माने में एक अंग्रेजी के शिक्षक हुआ करते थेI उन्हें अपनी अंग्रेजी पर बड़ा नाज़ थाI क्यूँ न हो, उनसे फर्राटेदार अंग्रेजी कोई बोलता भी तो न थाI मंच पर भाषण देते समय तो बिजली सा प्रतीत होते थेI सूट-बूट में अक्सर लोग उन्हें विलायती समझ बैठते थेI

समय बीतता गयाI शिक्षक महोदय की ख्याति बढती गयीI अब तो उनके जैसी अंग्रेजी पूरे इलाके में कोई न बोलता था , चाहे कितना भी प्रयत्न कर लेI इसी बात पर शिक्षक महोदय की पदोन्नति हुईI उन्हें विद्यालय का प्रधानाचार्य घोषित किया गयाI फिर क्या था, सारी कक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्य कर दिया गयाI महाशय मेरी पूरी बात तो सुनिए! और हिंदी वर्जित!

भगवान् गणपति सा पेट लिए बेचारा पप्पू अक्सर अपने दोनों कानों को पकडे हुए उठ-बैठ करता नज़र आ जाता थाI लाख कोशिशों के बाद भी जब अंग्रेजी उसके पल्ले नहीं आई तो उसने विद्यालय त्याग देना ही उचित समझाI एक बार एक छात्र ने स्त्री पर कुछ शब्दों के बाण छोड़ेI उसे चार बेतें मिलीं- दो शब्द-बाण के, दो जो उसने हिंदी में छोड़े थेI

कुछ समय और बीताI मेरी मानिये तो इनकी अंग्रेजी समय के साथ और बेहतर होती जा रही थीI विद्यालय भी फल-फूल रहा थाI

महाज्ञानी, महाबलशाली भीम भी जब अहंकार से न बच सके तो फिर ये शिक्षक महोदय किस खेत के मूली थेI हो गया इन्हें भी अहंकारI सीधे मुह बात तक न करते थेI जो भी कहते, अंग्रेजी में ही कहतेI हिंदी तो लुप्त सा हो चला थाI

ये सब देख पप्पू एक लम्बी राहत की साँस ले लिया करता थाI शब्द-बाण भी अब अंग्रेजी में ही छोड़े
जाते थेI

लोगों की मानें तो एक रात इन्होने घर में घुस आये चोर तक से अंग्रेजी में ही पूछ डाला- ‘’ हु आर यू?’’ मालूम नहीं उस चोर को क्या ज्ञात हुआ पर वो सहसा भाग खड़ा हुआI

अंग्रेजी और अहंकार दोनों इस शिक्षक महोदय के अभिन्न मित्र बन गए थेI

एक दिन विद्यालय की छुट्टी के बाद ये अपने बगीचे में विचरण कर रहे थे, कि सहसा एक पपीता इनके सर को निशाना बनाते हुए नीचे आ गिराI लोग तो ये तक कहते हैं की इन्होने गुस्से में एक दिन उस पपीते तक से पूछ डाला था – ‘’व्हाई यू आर स्टिल ग्रीन?’’

शिक्षक महोदय अपने सर पर हाथ दिए नीचे की ओर बैठे कि उनके मुख से आवाज़ आई- ‘’आह’’ I
इस बार ‘’ओह शिट’’ न निकल सकाI

शायद इन्होने अपनी दादी-अम्मा से कहानियाँ हिंदी में ही सुनी थीI
‘’कभी अहंकार न करना’’ शायद ये बातें इनके पिता ने हिंदी में ही दोहराए थेI

हाँ, ये वही ‘’आह’’ थी जो शिक्षक महोदय के मुख से अक्सर निकल जाती जब ये चोरी-छुपे
घर से खेलने निकलते और चोट खाकर माँ की गोद में लिपटे होते थेI

इसके उपरांत भी इन्होंने अंग्रेजी फर्राटेदार ही बोलीI लेकिन अब अहंकार न रह गया थाI
विद्यालय में हिंदी वर्जित न रह गया थाI

मोटे तोंद वाले पप्पू ने भी आखिरकार विद्यालय में  आवेदन देकर पुनः प्रवेश पा ही लियाI

इतना ही नहीं, लोगों की मानें तो विद्यालय की चहारदीवारी पर शुद्ध, स्वच्छ अक्षरों में यह तक लिख दिया गया था-

“समूचे भारतवर्स को एकता की डोर में पिरोये कोई एक भाषा अगर रख सकती है तो वो मातृभाषा हिंदी ही है”- ‘राष्ट्रपिता’ महात्मा गांधी

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